शुक्रवार, १३ जुलै, २०१८

बिरहा की रैना

चुपके से जाना
बिरहा की रैना
उनसे कहना
भीगे हैं नैना
उनकी यादोंका ढेरा
तकीये पे बिखरा
भीतर खौफ सारा
बाहर घना अंधेरा
दूर बरखा बरसती
हौले गीत सुनाती
दिल बहलाती
जान भी जलाती
चुपके से रतिया
उन्हे देख के बतिया
मेरा हाल जो जिया
क्या वही हैं पिया
दूरीयां जिनका नाम
ये कैसे है काम
उनसे कह दो चुकाने
हिचकी के दाम
पधार के अब धाम
जा री जा रैना
बरखा संग होना
उनका दिल खटखटाना
उनसे जवाब लेना
सुबह की उडी ओस
नमकिन शामोंका  रोज
दिल की मछली
जिगर की बिजली
हरजाना कैसे होगा??
राह पर इंतजार करती
मैं खिडकी से सटकर ही खडी
दूर रिमझिम बुंदो की लडी
निंद अखियोंसे उडी
इन सबका हिसाब कैसे रखना

गुरुवार, १२ जुलै, २०१८

पुर उम्मीदी

‘‘तूम मेरे लेटर का जबाव क्यों नहीं दे रहे हो. दस दिन बीत गये है. तुमने पढा तो है ना...’’
‘‘आर यू क्रेझी. जबाव नहीं दिया मतलब तुम्हे समझ जाना चाहिए था. इतना भी नहीं जानती.’’
‘‘अं...जान तो गयी..लेकिन कहने और जानने के बीच बहुत कुछ.....
‘‘इतनी ना समझी! इतनी अडीयल. खुद को बेवकुफ क्यों बना रही हो.’’
‘‘ ना..ना बेवकूफ नहि हुं..पुर उम्मीदी हूँ..अब तुमही कहो उस उम्मीद के डोर का क्या करूँ. जो अब भी तुम अपनी हाथ में थामे हो. या तो काट दो या तो करीब खिंच लो.’’
फाईलों पर गढी नजर उठाकर उसने उसकी ओर बेरूखीसे देखा. वो अपनी होठोंपे मासूमसी मुस्कान लेकर  बडी अदबसे फिर भी खडी थी, उसके जवाब के इंतजार में.

नतीजा

एम. ए. का पहला वर्ष खतम होने आया था. एक्झाम कुछ ही दिनोंमे शुरु होनेवाले थे. महिनाभर पहले बिते स्टडी टूर के आठ दिनोंका नशा अबतक सभी पाठकोंं पर था. इस स्टडी टूरने सबको जैसे करीब लाया था. जिनके बीच मनमुटाव था, तकरार थी, शिकायते थी...उनके भी बीच आपसी दोस्ती बन गयी थी. उसके लिए तो वह स्टडी टूर जैसे उसके इर्दगिर्द घुमने का लायसन्स बन गया था. पुरा वक्त सभी लडके-लडकी साथ घुम रहे थे..बिना किसी छानबिनवाली निगाहोंके. रात क्या, दिन क्या..क्लास की दस लडकीयॉं और पंधरा लडके एकही साथ थे.
साल के पहले दिन ही उसे वो भा गयी थी. डिपार्टमेंट की दुसरी गोरीचिट्टी लडकीयों जैसी खुबसूरत नहीं थी. उससे मुतासिर होनेवाली तो कोई खास बात उसके पास नहीं थी. पर उसमे कुछ था, जो उसे उसकी ओर खिंचता था. यह हाल उसके अकेले का ना था.. उस साधारण से दिखनेवाली लडकी के लिए बिलकुल बराबर की कशीश उसे अपने ही दोस्त में नजर आती थी. सच कहे तो दोस्त की कशीश ही उसे उसकी ओर बढने के लिए उकसाती रहती थी..रंगरूप की बात होती तो वो झटसे ऐसे प्रभावोंसे निपट लेता. पर यहां रंग रुप का चक्कर नहीं था मतलब कुछ और बात है जो उसके लिए इतनी बेकरारी पैदा करती थी. यह सोचकर उसे खुद ही एक राहत मिल रही थी. इस तरह अपने दिल को टटोलते टटोलते वो कब उसपर पुरा का पुरा लुब्ध हुवा उसे समझ ही नहीं आया. स्टडी टूर से वापसीवाले दिन उसने हिम्मत जुटाके उसे सीधे सामनेसे खत दे दिया.
बिना कुछ कहें. उसने वो ले लिया. रूमपर आकर उसने उस खत की हर एक लब्ज को बडी दिलचस्पीसे पढा.
दुसरे दिन डिपार्टमेंट की बाहर वह उसकी राह देखही रहा था. उसने जबाव दिया, ‘अपनी पढाई पर ध्यान देते है.’ इतना कहकर वह चली गयी. उस रोज के बाद उसने भी उससे कुछ ना कहा, ना पुछा, ना बात की.
बस दोनो अपनी अपनी पढाईमें जुट गये. उसने अपनी पढाईपर ध्यान दिया और इसने अपनी पढाई पर लक्ष केंद्रीत किया.
नतीजा जब आया तो दोनो ही अपनी अपनी परिक्षाओंमें अव्वल आये थे.

कमीनापन

"साला ये लडकिया भी ना बहुत कमिनी होती है..दोस्ती मे भी उनके नखरे उठाने पडते है.."
"अच्छा, तू कितानोंके उठाता हैं. "
"यही कही चार पांच तो होगीही. हां अब ऐसे मत देख. मारोगी क्या? करना पडता है. तू ना समझेगी."
"सो तो है..मैं नहीं समझुंगी. अच्छा चल ये बता उनमेसे तेरे नखरे कितने उठाते हैं.."
"वही तो साला प्राबलम हय..उनमे से एक भी नहीं उठाती. हां लेकीन कोई हैं जो   उठाती भी है नखरे और करती भी नहीं.. " वो उसे निहारते कहने लगा.
"समझा साले लडके भी कमीने होते हैं.."
"अरे पर तू तो कह रही थी की ये तो बस वो दोस्ती से कुछ और हो तो उसके चक्कर मे..."
वो पिछेसे उसकी बात को याद करके दोहराता रहा..वो लेडीज डब्बे मे चढ गयी..! 

बरखा पिकनीक

‘‘उफ् क्या तुम्हे बारीश बिलकुल पसंद नहीं. छत्री, जर्किन, रेनकोट इतना सबकुछ लेकर आयी हो. इस ब्रीजसे पानी का बहाव देखना तो बहाना है. असल में तो मुझे तुम्हें यू कसकर पकडके आसामान को बरसता देखना होता है.  ’’
‘‘सो. देखेंगे. मैंने कहॉंं मना किया.’’
‘‘पर तुम भिगती कहॉं हो. अपने उपर ये इतने परक जो चढा लेती हो. बारीश में भिगने का अपना एक मजा होता है वो रेनकोट के भीतर या छत्री के नीचे नहीं आता.’’
‘‘मैंने तुम्हे तो मना नहीं किया ना. कुदरत की आगोश में खोकर तुम जो हर बुँद को अपने अंदरतक महसूस करते भीगते हो ना..तुम्हारे उन हसीन भीगे एहसासों को देखना मुझे तुम्हारा और भी दिवाना बनाता है पर मुझे भीगनसे सर्दी होती है, मैं क्या करूॅ?’’
‘‘रहने दो, इसका तो बस एकही मतलब है, हम कभी बारीश का त्योहार नहीं मना सकते. ’’
‘‘क्यों नहीं ? हां, मुझे सर्दी होती है. पर मैंने ये कब कहॉं की मुझे बारीश ही पसंद नहीं. मुझे बारीश भी पसंद है और तुमभी.  कहॉं जायेंगे बताओ, तुम्हारे बाईकपर तुम्हे लिपटकर बैठूंगी. फिर तुम चाहे जितने बारीशे घुमा ले आओ.’’
‘‘और फिर तुम्हारी सर्दी...ठंठ लग गयी या बिमार हुई तो...रहने दो.’’
‘‘अजी सरकार, मोहब्बत में सामनेवाले को तवज्जू देने का मतलब हमारी तमन्नाओंको गला घोटना नहीं होता है.’’
‘‘हां, बिलकुल वैसेही सामनेवाले की जान भी जोखीम में डालना नहीं होता.’’
दोनों की बात आपसमे टकरा गयी. दोनो ही हंस पडे. ब्रीज से पानी का बहाव देखते दोनों ही अपनी बरखा पिकनीक का प्लॅन बनाने में जुट गये.

बुधवार, ११ जुलै, २०१८

इश्क मे अजनबी...

स्टेशनपर उसकी राह तकते तकते वो परेशान हुवा था. लोकलके टिकट कतार से बचने के लिये उसे ऍप से टिकट भी बुक करा दी थी, फिर भी पता नहीं वो देर क्यो कर रही थी? उपर से उसके पेट के चुहे बाहर निकलने तडफ रहे थे. आखीर वो आ गयी. चर्चगेट से दादर आते आते उसने दोपहर के साडे तीन बजा दिये थे. फिर उन्हे इकठ्ठे चार बजे एक मिटींग भी पोहचना था और दोनों को ही अपने पेट के चुहों का खयाल करना था.
दादर स्टेशन बाहर के हाटेल में दोनो बैठ गये.
वेटर ने ऑर्डर पुछा.
''जल्दी क्या मिलेगा... ठीक है तो पाव भाजी लेलो. तुम क्या खाओगी?''
"जल्दी में तो पाव भाजी के अलावा उडदवडा सांबार ही नजर आ रहा है, वो ही ला दो भाई."
वेटरने अॉर्डर टेबल पर लगा दी.
"और एक कोक भी लेना." उसने जैसे ही ये कहा लडकीने चौंक कर देखा.
जैसे वो नॉनव्हेज हो और लडकेने कोई घासफुस की ऑर्डर दी. फिर भी कहा किसी ने कुछ नहीं.
वेटर ने दोनों के बीचोबीच कोक रख दी.
"कोक का नाम सूनते ही इतनी हैरान क्यों हुई? तुम भी पिलो; मना थोडी कर रहा हूँ."
"मुझे नहीं पिना है. मैने वैसी प्रतिज्ञा ली थी."
"क्या? प्रतिज्ञा? कब?" अब उसने उसे हैरानियात से देखा. मन में हंस भी पडा पर जतया नही.
"कालेज में... खैर छोडो तुम पिलो."
"कोक ना पिने की भी प्रतिज्ञा होती है क्या? वैसे क्यो ली थी ये प्रतिज्ञा?"
"रहने दो. तुम फिर पियोगे नहीं."
"तुम बताओ तो सही. मुझपर किसी बात का असर नही होगा. मैं एक झपेट मे निगल लूंगा."
"अच्छा, तो सुनो. कॉलेज मे एक संस्था आयी थी. उन्होंने एक डॉक्युमेंटरी दिखाई थी. जहां यह कोक बनानेवाली फॅक्टरिया खडी थी, वहाँ फॅक्टरी की वजहसे उन गावो को ही पिने का पानी नही मिल रहा था. उपरसे ये कोक कंपनिया गंदा पानी नदियो मे मिलाती थी. गाववालो के सफेद चावल भी काले पकते थे. कितने लोगो की उंगलिया झड चुकी थी. किसीका पेट फुल गया था. बच्चे तो बिमारी लेकर ही पैदा हो रहे थे. बस! तब हमे शपथ दिलायी की, ऐसे कोक हम नहीं पियेंगे. बस, तबसे छूंती भी नहीं."
इतना कह कर वो अपने उडद वडा सांबार मे डूब गयी.
उसके दिल में ख्याल आया, 'हद हो गयी! कॉलेज की बात अबतक पकड के बैठी है? ऐसेही मुझसे कोई वादा कर ले तो...' उसने दिल की वह बात वही छोड दी. फिर गला साफ करते हूवे उसने लडकी को पुछा,
"अब मैं क्या करु? चपटालू या.."
"तुम्हारी मर्जी. वैसे मुझे पुंछ रहे हो तो मना ही करूंगी."
"तुम अपनी इन प्रतिज्ञाओं के चक्कर मे मेरे पैसे बचाओगी या जेब खाली करोगी?" उसने झुंझला कर कहा.
वो हाथ धोने के लिये खडी हुई. मुस्कुरा कर बस उसने इतना ही कहा,
"आजमा लो... अभी थोडा और रास्ता भी तो इकठ्ठे चलना हैं." वो वॉश बेसिन के तरफ जैसे ही मुड गयी. वह समझ गया की, इश्क मे इतना भी अजनबी रहना बेवकुफी होती है!!

मंगळवार, १० जुलै, २०१८

बेपता खत

अच्छा सून...दो दिन से तेरी बहुत बहुत याद आ रही थी..एक खालीपनसा महसूस हो रहा था...पिछले दो दिनसे तेरे यादोंकी बारिश मुझे भिगाये जा रही थी...जगह जगह मैं तुम्हे मिस कर रही थी..वजह बेवजह..! फिर बैचेनी इतनी उमड आयी की, मैंने एक कविता ही लिख दी..अब हंस मत...अच्छा लिखा था, पर अब तू रुठा ही ऐसा है कि तुम्हे भेज नही सकती थी, इसलिए फिर वह कविता एक दुसरे दोस्त को भेज दी...

तेरे खयालों के उलझन में लिपटे जज्बात तुझसे बेखबर दोस्त तक पहुंचा दिये...अजीब हैं ना..मैं हूं ही अजीब.. !! खैर असली बात तो ये है की उस दोस्त ने भाप लिया, तेरी यादोंसे मेरा झुंझना.. तनहा महसूस करना..उसने कविता के जवाब में कहा,  हो सके तो तेरा ये खालीपन किसी और सच्चे दोस्त से भर जाये…’ कितनी खुबसुरत दुवा थी..मैने भी झटसे आमीन, सुम्मा आमिनकह दिया..दुवा खाली कैसे जाने देती! पर तुम्हे पता है...दुसरे ही पल खयाल आया की तेरी जगह..तुने पैदा किये इस खालीपन का सर्कल कोई नही भर सकता...मैं चाहती भी नहीं की वो भर जायेकोई और उस जगह का हमदोस्त कहलाये..ना ना बिलकुल जरुरी नही...ये सारी बैचेन खलबली है ना यही ठीक है...!

वैसे कल तेरी यादे बेपरवाह होकर परेशान कर रही थी, इसके बावजुद भी मुझे सुकून की नींद आयी…. जानते हो क्यो?

तुम्हे मिस करू इस कदर अकेलेपन का एहसास देनेवाला...इस तनहाई के भवर मे सुकून भी देनेवाला तू और सुकून मे खलल डालनेवाले तनहाई की, अकेलेपन की जगह भर जाये कह कर मेरे चैन ओ राहत की दुवा करनेवाला वो दोस्त..
दोनो भी अपनी अपनी बिंदुओंसे मेरे लिये इतमिनान हि तो मांग रहे थे...मुझे अपनी अपनी दोस्ती से खुशकिस्मत बना रहे थेमुझे अजीज कर रहे थे..!

तुम्हे क्या बताऊं कितनी सुकून की नींद सोयी…!

सोमवार, ९ जुलै, २०१८

किरणसाठी

झरोकोसे तुम्हे झाकते हुये, ये बारीश
सब कुछ नया नया सा लगता है मुझे
इतनी सुथरी सी लगती है जिंदगी कि
जैसे मै उसके कश्मकश्म से दूर 
अभी अभी मा के कोक से पैदा हुवा कोई बच्चा !



याद

ऑफिस की सिडियोंसे
जब उतरती हुं अकेले
या चलती हूं उन रस्तोंपर
जहॉंसे हम साथ गुजरते थे
तुम आसानी से तनहा कर देते हो
अपने ना होने के एहसास से

तुम्हे याद है,
मेरे कुछ कहने से पहले
तुम समझ जाते थे
मेरे साथ क्या है मसला
अब जो मसला है मेरा
तुमसे ही जुडा, बताव
कैसे मिटाये ये फासला

बडी खुशमिजाज थी
हमारी दोस्ती
हसीन, गहरी, डिजेंडर
मैं तुम्हारी कानखिचाई मे जुटती थी
तुम मुझे इतमिनान से समझाते
मैं घंटो बतीयाती रहती
तुम गौर से सुनते थे
अब बता मेरे पेशानी मे
तुझसा दोस्त कहॉं से लिखू

उपर से सितम देख, ए दोस्त
बडा बेरेहेम है ये वक्त
तुम्हे भूलने पे मजबूर कर रहा है
जब की मैं रखना चाहू जतन
तुम्हे अपने ज़हन मे

कहते है समय बितने पर
जख्म भरते है
धीरे धीरे दर्द का दर्द
बेमालुम होता हैं

पर मैं खुद इस जख्म को
हवा देना चाहती हुं
तुम्हे अपने याद मे
जमा रखना चाहती हुं

कुछ तो होगा तेरे दोस्ती का
मेरे माजी पर असर
मैं आखरत तक तुम्हे
साथ पाना चाहती हुं

तुम दुनिया से रूठे हो
तो रूठे रहो..
मेरे जेहन से, यादोंसे
मिटने की इजाजत कभी ना मिलेगी
कह दो अपने वक्त से
नहीं पसीजेगा दिल
किसी भी वक्त…
या फिर कितना भी गुजर जाये...!

शनिवार, ७ जुलै, २०१८

पालखी

''मी पाटील इस्टेटजवळ आहे.''
''पुढे गेलास तू. मी अजून वाकडेवाडी पुलावर आहे.''
''पालखी तर बरीच पुढं आलीये. तू काय करत बसलीस? बरं, असू दे आता. ऐक मी इथं पत्रकार कक्षाजवळ असेन. इथं ये. ''
''नको. तू हो पुढं. मी येते मागून.'' 
''नाही. मी थांबणार.'' 
''अरे, पाऊस येईन असं वाटतंय. तू जा.''
''मग ये ना लवकर. उचल भरभर पावलं. सांगायचंय काहीतरी.
............''
...........................

''अरे वाह! ये मला पण नाम लावायचंय असं तुझ्यासारखं. किती मस्त दिसतोयस.''
''थांब, बघू. चालता चालता कुणीतरी दिसेल. हं..ओ, माउली  ओऽऽऽ माउली या आमच्या मॅडमला लावा ना हा नाम.....हं तूही गोड दिसतेयस.''
''तुला माहितीये, एक पंच्याण्णव वर्षाच्या आजी चालत आल्यात. आणि त्यांच्यासोबतच्या जैतून बी तर चाळीस वर्ष येतात नित्याने.''
''हं.''
''काय झालंय? नेहमीसारखा उत्साही नाहीस?''
''मगाशी एक पथक भेटलं. कुणाचं होतं माहितीये, आत्महत्या केलेल्या शेतकर्‍यांची मुलं. काही झालं तरी आत्महत्या करू नका, मुलं एकाकी होतात. आम्ही जे अनुभवतोय ते कुणा मुलाच्या वाट्याला येऊ नये म्हणून ते फलक घेऊन निघालेत.''
''ओह..''
''आपण आपले ताण सोडवले पाहिजेत. मला तर साध्या चटक्याचीही भीती वाटते. मग लोकं कसं पेटवून घेतात. फास लावून घेतात. श्शीट यार... मी बोललो ना त्यांच्याशी तर चर्र्‍र झालं. अडनिड्या वयात बाप गेल्यानं त्यातल्या एकाला घराची जबाबदारी घ्यावी लागली. कुणाचं शिक्षण सुटलं. कुणी आपल्या आईला गावी ठेऊन दुसर्‍या गावी काम करतंय...जाऊ दे नकोच ते. क्षणभर मी विचार केला माझे वडिल...''
''ओहो पाणी घे. प्लीज, इतकं मनाला नको लावून घेऊ. इतकं मनाला लावून घ्यायचं नसतं. तुला माहितीये, मला खात्री आहे तू तर खूप चांगला बाप बनशील. बघ तू..''
........
''..हो, हो. मी जाईन यंदा पालखीला. आळंदीपासूनच कव्हर करेल पालखी. ठेवू फोन.''
हो ना, मला शोधायचंय ते आत्महत्या केलेल्या शेतकऱ्यांच्या मुलांचं पथक. त्यांच्या पथकानं हादरून गेलेल्या माझ्या मित्राची, बाप होण्याची गोष्ट सांगायचीय त्यांना. वय वर्ष १ महिन्याचं पिलू पाळण्यात जोरजोरात पायाने खेळत होतं तेव्हा तिच्यासमोरच तो पंख्याला गळफास लावत होता...शांतपणे! सांगायला तर हवंच ना..

शुक्रवार, ६ जुलै, २०१८

घर्षण

नेमकी लिफ्ट बंद होती. तिचे पाय आधीच लटपटत होते. आता चार मजले चढून जायचे. पाय गळून गेल्यासारखे झाले. त्याच्याकडे पाहिलं तर लिफ्ट बंद असल्यामुळे तोही किंचित वैतागला होता पण तिच्याइतका नाही. त्यानं प्रेमाने हात पुढे केला. तिनेदेखील हात दिला. एकेक पायरी मागे जात होती. तसा तिच्या हातांना कंप आणि घाम फुटत होता. तो मात्र कुल वाटत होता. लॅच उघडून दोघं आत शिरले आणि त्यानं आतून लॅच लावून दार पुन्हा बंद केलं. अगदी शिताफीनं. तिचेे श्‍वास वाढले होते. हृदयाची धडधड आणि शरिराची थरथर तिला एकदम जाणवू लागली होती. तो लॅच लावून वळला तसं त्यानं आवेगानं तिला मिठीत घेतलं. तिच्या गळ्यातली ओढणी बाजूला फेकून त्यानं मानेवर ओठ टेकले आणि तिच्या देहातील थरथरीचा वेग वाढला. मेंदू मात्र अफूची गोळी खाल्ल्यासारखा निपचित झाला. त्यानं दाराजवळच्या भिंतीवर तिला रेललं. तो अधिक जवळ आला. त्याच्या अंगाअंगाचा स्पर्श तिच्या शरिरात संथपणे झिरपत होता. आणि एकदम त्याचं ताठरलेलं लिंग तिच्या मांडीला स्पर्शून गेलं. त्या घर्षणाने  तिला काहीतरी विचित्र वाटलं आणि तिने त्याला मागे ढकललं.
‘काय झालं?’
‘आत्ता नको प्लीज.’ तिने त्याच्याकडे न पाहताच सोफ्यावर पडलेली ओढणी उचलली.
‘ओके. रिलॅक्स. पण तू इतकी नर्व्हस का झालीस.’
उत्तरात काय बोलावं न कळून ती कसनुसं हसली. काहीच झालं नाही असं खूणेनंच म्हणाली. तो तिच्या जवळ येऊन बसला तशी ती पुन्हा बेचैन झाली.
‘माझ्याकडून काही...मी खूप धसमुसळेपणा केला का? तुला पाहिल्यापासून वेडा झालो होतो गं. तुझा साधा हातही हातात घेता येत नव्हता. इतकी वर्ष मी कधी कुणाकडे असं पाहिलंही नाही. सतत कामात. पण लग्न ठरल्यापासून तुला किमान जवळून पहाव तरी वाटायचं. आज आमल्याने त्याच्या घरची चावी देऊन ठेवली...आणि मग’
‘आय डोन्ट नीड एनी एक्सप्लेनेशन. जस्ट लिव्ह इट फॉर नाऊ.’ तिचा नर्व्हसनेस कमी झाला नव्हता.
‘मी आवडतो तरी ना तुला..’
‘आत्ताच रजिस्टर मॅरेज करून येतोय आपण.’
‘दॅटस नॉट द पॉईंट. मी आवडतो ना तुला?’
‘आवडला नसतास तर सहा महिन्यांपूर्वीच सांगितलं असतं ना..’
‘मग? सॉरी, डोन्ट टेक मी रॉंग...पण तू आत्ता मला मागे ढकललंस तर त्यात एक झिडकार होता.. होता ना.’
‘अं..’ ती एकदम चपापली. त्याच्या डोळ्यांतला भाव तिला भेदत गेला. ‘मला कल्पना नव्हती की आपण इकडं कुठं येऊ. मे बी त्यामुळं...’
‘तू एक्सायटेड नव्हतीस मला भेटायला, स्पर्श करायला..’ त्याने तिच्या नजरेत नजर गुंतवून विचारलं. तिच्या हातांना भरपूर घाम होता. ओठ शिवल्यासारखे तिने मिटून घेतले होते. ‘मी फक्त कीस करणार होतो. बाकी काहीच नाही गं. एनीवे, अजून पंधरा दिवस आहेत आपल्या साग्रसंगीत लग्नाला. इथं, बेंगलोरमध्ये देवळात लग्न करायचं असलं की आधी लग्न रजिस्टर करून यावं लागतं म्हणून आज..त्याअर्थी आजची रात्र..’बोलता बोलता तो थांबला आणि त्याने पटकन तिच्या गालावर ओठ टेकले. तिच्याकडे न पाहता सोफ्यावरून उठला आणि म्हणाला, ‘निघूयात.’
ती निश्‍चलपणे बसून राहिली. त्याचा मूड घालवला का? हिरमोड केला का? शांतपणे त्याला मागे सारता आलं असतं ना..किंवा सांगताही..पण काय सांगायचं? तुझ्याशी इतक्यांदा बोलले, भेटले तरीही आज जेव्हा माझ्या मांडीला झालेलं ते घर्षण फार अवघड वाटलं...असं नाही की हे सारं कळत नाही. ते होणार याचीही कल्पना आहे. पण तरी ती घटिका जेव्हा अचानक समोर आली...रितसर जरी आली असती तरी कदाचित पहिल्यांदा तर काही वाटणारच ना...तो तर फक्त किस करणार होता आणि मी त्या स्पर्शानं काय काय विचार केला क्षणभरात...मी हे सांगायला हवं का? तो काय विचार करेल मग? स्पर्शातले रिलकटन्स न बोलता गळेल? ती बसूनच राहिली.
‘चलो, निघूयात.’
‘अं. तुला घाई नसेल तर थोडावेळ बसूयात. मला काहीतरी बोलायचंय...खरंतर सांगायचंय..’

हरवणं

माझा फोन कुठाय? त्यानं निमूट मवाळपणे विचारलं.
नाही रे माझ्याकडे. एका मिनिटात पाच वेळा तू हेच विचारलं आणि मी तुला तेच उत्तर देत आहे.
खरंच नाही? ओके ठीक आहे.
ओके? अरे फोन सापडत नाहीये ना..इतका कुल कसा राहू शकतो. चल मी शोधायला मदत करते.
तो मोठ्याने हसला.. नको तुझी शोधण्याची मदत..खोटी खोटी मदत. त्यापेक्षा फोन दे.
पुन्हा तेच.
नाहीये ना..मग उरक काम.
हां मोठ्या लोकांची बातच और...अॅपलच्या फोनची ती काय किंमत.. भारी माज आहे.
माज नाही. अंदाज.. अंह पक्की खूणगाठ आहे..
कसला अंदाज..कसली खूणगाठ
ऑफिसातून बाहेर पडताना फोन मिळणार अन् तो तूच देणार...माझ्या वस्तू हरवतात..मला सापडत नाहीत तेव्हा त्या तुझ्याकडेच असतात. इट्स ऑलरेडी प्रुव्हण..
हे भारीये तुझं...तुझी कुठली वस्तू हरवली की तू आपलं माझ्याकडे बोट दाखवून मोकळा..हे असं सरळ माझ्याकडे येणार, जाब जवाब मागायला. उद्या कधी जर  तुझं मन हरवलं तर काय तेही माझ्याकडेच येणार शोधायला..
हट् तेव्हा तर तूच येशील ना माझ्याकडे, तुझं मन द्यायला..!!

तिने  त्याची नजर चुकवून गडबडीने  त्याचा  फोन डेस्कवर  ठेवला. सटकली.  पण चुकून स्वतःचा फोन तिथं विसरली त्यांचं काय..


मोहोब्बत

अक्सर जब लोग मुझे पूछते है कि
क्या तुमने कभी किसी से
मोहब्बत की है,
क्या तुम्हे कभी किसी से
मोहब्बत हुई है,
मै तपाक से जवाब देती हूं, नही !
मुझे कभी किसी से
मोहब्बत नही हुई
पर ये ना कहते वक्त
नजाने मेरे दिल में
तुम्हारी तस्वीर क्यों उभरती हैं...


बडा मुश्किल है ये तुम्हारे लिये
मोहब्बत से इन्कार करना
बडे ताव से नकारती हो
अपने जजबात, फिर खुद ही
हैराण मालूम होती हो
सच बताओ, क्या तुम्हे भी
पता है,
तुम्हारी कजरारी नयनो मे..
मेरा चेहरा दिख ही जाता..
तुम्हारे हर ना के साथ

हर इन्कार के बाद.

सुफियान अन त्याचे मित्र

गोष्ट तशी गंमतीची.   माझ्या घरासमोर राहाणारी दोन छोटी मुल माझ्या तीन वर्षाच्या सुफियानचे मित्र आहेत. त्यातील छोटा हा सुफियानपेक्षा फक्त ...