शनिवार, २१ जुलै, २०१८

प्रपोजल

''....वैसे तुम उस दिन क्या कहना चाहती थी...हम एक दुसरे को बतौर लाईफ पार्टनर की तरह टेस्ट करे.  क्या हम एक दुसरे के लिए कम्पॅटिबल है की नहीं, ये हम जॉंचेगें, तराशेंगे. मतलब क्या करेंगे?''
''आय डोन्ट नो एक्झॅक्टली. मेरे पास उसका ब्लू प्रिंट थोडी है. कमॉन, कुछ भी. वो तो उसवक्त मेरे दिमाग में आया तो मैंने कह दिया था. मेरा कहने का मतलब था की, हम एकदुसरे के साथ वक्त बितायेंगे, किसी भी नॉर्मल फ्रेंडस की तरह मगर बॅक ऑफ माईंड हमें पता होगा की हम एक दुसरे के साथ जिंदगी बिताना चाहते है क्या? इसको भी टटोल रहे है..''
''और तुम ये करना क्यों चाहती हो?''
''मेरे अब्बा को ना मेरी शादी की बडी फिकर हो रही है. और मैं शादी उसीसे करना चाहती जिसका साथ अच्छा लगे. वैसे तुम मुझे ठीक ठाक लगते हो. पर हमारी इतनी बातचीत कहॉं होती है. और सिर्फ ठीक ठाक लगनेसे क्या होता है. अच्छा लगना चाहिए ना..तो अब मैं अकेली ही यह टटोलती रहूँ इससे बेहतर है की हम एक ही वक्त दोनों भी इस बात को टटोलकर देखे. इसलिए पुछा..''
''बिलकुल बकवास है यह. कोई इस कदर तय करके प्यार नहीं कर सकता.''
''प्यार करने कौन कह रहा है? प्यार की तो कोई बात ही नहीं मैं तो शादी की बात कर रहीं हूँ.''
''और तुम्हे लगता है की बिना प्यार किये शादी हो सकती है...''
''अब अरेंजे मॅरेज क्या होते है? पहले थोडी ना पता होता है...बस उसी तरह हमारा भी अरेंज ही पर थोडा ज्यादा सोच समझकर किया मॅरेज होगा. आयमिन दोनों को ठीक लगे तो पर इसके लिए हम कुछ वक्त साथ गुजारेंगे.
मेरे तो सरके उपरसे जा रही है तुम्हारी बाते. माना की अरेंज मॅरेज में पहले नहीं होता होगा पर बाद मे तो प्यार हो ही जाता है..प्यार के बिना शादी अधूरी है.''
''हां प्यार जरूरी होता होगा पर मेरे लिए उसका साथ भी. एकदुसरे के साथ कंम्फर्टेबल लगना जरूरी है. एकदुसरे के साथ अच्छा लगना जरूरी है. ये अच्छा लगनेवाली फिलींग तो तब ही आती जब आपको सामनेवाला इन्सान पसंद आये. जब पसंद आयेगा तो प्यार भी लगेगा. पर मुझे प्रायोरिटीमे किसीका साथ अच्छा लगना चाहिए. अब गड्डे में गिरना ही है तो सोच समझकर गिरे ना..कमसेकम वहॉं बोअर ना हो इसकी फिकर तो हमेंही करनी है.''
''जिससे प्यार होगा उसका साथ तो अच्छा लगेगाही.''
''हां लेकिन जिससे प्यार हो जाये उसका साथ हमेशा ही अच्छा लगेगा ये जरूरी नहीं. कभी कभी प्यारवाला साथ ना एक्स्पायरी डेट के साथ आता है. जैसे शादी हुई आप एकदुसरेसे इरीटेट होना शुरू कर देते. अब मेरे ही कुछ फ्रेंडस देखो जो पहले एकदुसरे के प्यार में खोये रहते थे आज शादी के बाद दोनो एकदुसरे के साथ उब गये है. उन्हे एकदुसरे की दखलबाजी बिलकुल बर्दाश्त नहीं होती. एकदुसरे को वो अगर कुछ राय दे तो उन्हे वो राय नहीं इंटरफेयर लगता है...बस मुझे तो पहले साथ होना अच्छा लगना चाहिए. उसमें खूशी मिलनी चाहिए. हम साथ ढंग से बात कर सके, एकदुसरे की का रिस्पेक्ट कर सके तो ठीक है वरना लोग प्यार तो करते पर रिस्पेक्ट करना नहीं जानते. ''
''तुम्हारी फिलॉसॉपी कुछ ज्यादाही अजीब है. इसके लिए अलगसे दोस्त दोस्त खेलने की जरूरत नहीं. मुझे तुम्हारे इस प्रपोजलमें रत्तीभर इंटरेस्ट नहीं है..''
''अच्छा, ठीक है तो फिर...चलो बाय. मुलाकात की वैसे कोई गुंजाईश नहीं जिसके बदौलत मैं तुम्हे कहू की फिर मिलेंगे. ''
''अच्छा सुनो, क्या तुम इस तरह हर किसीको अपना प्रपोजल बताती रहोगी?''
''आय डोन्ट नो. सोचा नहीं. क्या पता जबतक कोई ना मिले मैं हर किसी को ऐसा पुँछू.. क्या पता किसीको ऐसा कुछ पुछनेेसे पहले ही मुझे किसीके वजूद का हिस्सा बनना पसंद आये. किसीको ऐसा बिना बतायेही उसके साथ रहना अच्छा लगने लगे...ऐसेमे तो मैं सीधी शादी के लिए ही प्रपोज करूँगी. और क्या है, जिसे जितना वक्त लगना है उसे उतना वक्त तो लगेगाही. बट एनीवे तुम जरूर याद रहोगे. हमारा पहला वक्त हमेशा याद रहता है. फिर चाहे वह निगेटीव्ह क्यों ना हो...''वह हँस पडी.
वो मुडकर लिफ्ट में चला गया. उसने देखा वह भी पलटकर  जा रही थी.  धीरे धीरे लिफ्ट का दरवाजा बंद हुवा. उसकी जाती हुई प्रतिमा दरवाजे के मिटतेही गायब हुई. लिफ्ट वही की वही खडी थी. उसने चौंक कर लिफ्ट के बटन्स की ओर देखा तोे कोई भी बटन प्रेस नहीं था. उसे पार्किंग जाना था और उसने सिक्स्थ नंबर पर प्रेस किया...

बुधवार, १८ जुलै, २०१८

कोई उनसे जाकर कहे

अरे यार कोई उनसे
जाकर कहे
खुदसे इतनी मोहब्बत ना करे
खुदपे इतना भी गुरुर ना करे
की हम कुछ लिखने के काबिल ना रहे…
जी, उनसे कह दो
हमारे हर नज्म के कहानियोंमे
खुद को ना तराशे
अपने अक्स का साया भी हमारी
वफा या इश्क मे ना तलाशे
हद है, हम बात खफा की करे
या बेवफाई की
तनहाई की करे, या बिती यादों की
हर नज्म पे हमे पुछते हैं के
इतनी बैचेन क्यो?
तुम्हे हमारी दस्तक सुनाई क्यों नहीं देती
देखो तो इन नज्मो को
घुम फिरकर वापस हमारे पास ही तो लोटती
हाय,
मान क्यो नही लेते
हमने उनसे कभी दिल ना लगाया
कभी उनसे रत्तीभर मोहब्बत ना हुई
हमने तो हजार दफा सीधा इन्कार किया
नजाने उन्हे ईकरार की खुशबू कहा से आती
बात को टालने की हमारी हरकत क्यो लगती
कोई कहे उनसे
जब मौका था..दस्तुर था
एक भी पहल ना की, हमे समझने की
हमसे बात या रूबरू होने की
बल्की अंजुमन में रूसवा करते रहे
अब खुदके एहसास ए जूर्म को
हमपर वजह बेवजह थोप रहे
हमारी किस्सों का जबरन हिस्सा बन रहे
खैर छोडों
उनसे जाकर कोई प्लीऽऽज कहे
बक्श द.. नज्म, अफसाने , हमें
और खुदका फिजुल गुरूर भी
कहना तो नही चाहते थे,
पर हमारे जज्बातों पर उनका ये हक जताना…
नापाकी का एहसास देता हैं..
तो कह दो उनसे
हाँ मोहब्बत की है हमने बेशक, बेहद
बस उनसे नही..कभी नही..बिलकुल नही..
और अब आखरी बार कहते है
हमारे इस बात के हक मे
ना कोई वजाहत पेश होगी,
ना कोई दलीले सुनी जायेगी‌…
कोई जाकर कह दो उनसे...

मंगळवार, १७ जुलै, २०१८

एक बन मस्का, एक चाय

आज फिर,
एक बन मस्का, एक चाय
ऑफिस देरी करने की तेरी राय

तुझे  याद है, मुझे तो खासा याद है...

बीच सडक वो चाय का ठेला
सिग्नल पे खडी झांसी की रानी
पास के पूल से बहता नदी का पानी
पडोस मे खडी एक  प्रेमीयों की बगिया
बगिया बुलाके कॉलेज में किस्सा बून लिया ..
वक्त बिता...पर असर ना बीता
बेरूखी का असार  बल्की बढता गया
:
क्या कहु..
आज फिर वही सिग्नल का चौराहा
सिग्नल पे खडी झांसी की रानी
पास के पूल से बहता नदी का पानी
बेयकीनी से तुझे मुझे देख रहे

उन्हे अब क्या क्या बताऊ
अजनबी सा लगा था अर्सो बाद मिलना
गिले शिकवे तो बनी थी भुला अफसाना
फिर
अपनी मोटी गहरी आंखों से  तेरा मुझे तवज्जू देना
मुझे अपनी तस्सुवर मे अजीज करना
बिना तेरे कहे तेरी आवाज मेरे कानोमें गुंजना
तेरे हाथ का लम्स मेरे हाथपर रूकना
तेरा बेझिझक ऐसे मेरे कांधेपर सर रखना
मेरी गर्दन पर हलकेसे कोई शरारत करना
यू बारीश का बेअदब  टुटके बिखरना
मेरा भिगना तेरे निगाहों से महसूस करना
अब और तुझसे नफरत के मैं लायक नहीं रही
अब और तुझसे लापरवाह रहू, मुझे मुमकीन ना रहा...

ये वाकिया कैसा बना..पता नही,
खफा रहना था ता उम्र तुझसे
उम्रे दराज के लिये तुझमे उलझ गयी..

आज फिर,
एक बन मस्का, एक ही कप चाय
ऑफिस देरी करने की
उफ आज तो न जाने की तुम्हारी राय..

शुक्रवार, १३ जुलै, २०१८

बिरहा की रैना

चुपके से जाना
बिरहा की रैना
उनसे कहना
भीगे हैं नैना
उनकी यादोंका ढेरा
तकीये पे बिखरा
भीतर खौफ सारा
बाहर घना अंधेरा
दूर बरखा बरसती
हौले गीत सुनाती
दिल बहलाती
जान भी जलाती
चुपके से रतिया
उन्हे देख के बतिया
मेरा हाल जो जिया
क्या वही हैं पिया
दूरीयां जिनका नाम
ये कैसे है काम
उनसे कह दो चुकाने
हिचकी के दाम
पधार के अब धाम
जा री जा रैना
बरखा संग होना
उनका दिल खटखटाना
उनसे जवाब लेना
सुबह की उडी ओस
नमकिन शामोंका  रोज
दिल की मछली
जिगर की बिजली
हरजाना कैसे होगा??
राह पर इंतजार करती
मैं खिडकी से सटकर ही खडी
दूर रिमझिम बुंदो की लडी
निंद अखियोंसे उडी
इन सबका हिसाब कैसे रखना

गुरुवार, १२ जुलै, २०१८

पुर उम्मीदी

‘‘तूम मेरे लेटर का जबाव क्यों नहीं दे रहे हो. दस दिन बीत गये है. तुमने पढा तो है ना...’’
‘‘आर यू क्रेझी. जबाव नहीं दिया मतलब तुम्हे समझ जाना चाहिए था. इतना भी नहीं जानती.’’
‘‘अं...जान तो गयी..लेकिन कहने और जानने के बीच बहुत कुछ.....
‘‘इतनी ना समझी! इतनी अडीयल. खुद को बेवकुफ क्यों बना रही हो.’’
‘‘ ना..ना बेवकूफ नहि हुं..पुर उम्मीदी हूँ..अब तुमही कहो उस उम्मीद के डोर का क्या करूँ. जो अब भी तुम अपनी हाथ में थामे हो. या तो काट दो या तो करीब खिंच लो.’’
फाईलों पर गढी नजर उठाकर उसने उसकी ओर बेरूखीसे देखा. वो अपनी होठोंपे मासूमसी मुस्कान लेकर  बडी अदबसे फिर भी खडी थी, उसके जवाब के इंतजार में.

नतीजा

एम. ए. का पहला वर्ष खतम होने आया था. एक्झाम कुछ ही दिनोंमे शुरु होनेवाले थे. महिनाभर पहले बिते स्टडी टूर के आठ दिनोंका नशा अबतक सभी पाठकोंं पर था. इस स्टडी टूरने सबको जैसे करीब लाया था. जिनके बीच मनमुटाव था, तकरार थी, शिकायते थी...उनके भी बीच आपसी दोस्ती बन गयी थी. उसके लिए तो वह स्टडी टूर जैसे उसके इर्दगिर्द घुमने का लायसन्स बन गया था. पुरा वक्त सभी लडके-लडकी साथ घुम रहे थे..बिना किसी छानबिनवाली निगाहोंके. रात क्या, दिन क्या..क्लास की दस लडकीयॉं और पंधरा लडके एकही साथ थे.
साल के पहले दिन ही उसे वो भा गयी थी. डिपार्टमेंट की दुसरी गोरीचिट्टी लडकीयों जैसी खुबसूरत नहीं थी. उससे मुतासिर होनेवाली तो कोई खास बात उसके पास नहीं थी. पर उसमे कुछ था, जो उसे उसकी ओर खिंचता था. यह हाल उसके अकेले का ना था.. उस साधारण से दिखनेवाली लडकी के लिए बिलकुल बराबर की कशीश उसे अपने ही दोस्त में नजर आती थी. सच कहे तो दोस्त की कशीश ही उसे उसकी ओर बढने के लिए उकसाती रहती थी..रंगरूप की बात होती तो वो झटसे ऐसे प्रभावोंसे निपट लेता. पर यहां रंग रुप का चक्कर नहीं था मतलब कुछ और बात है जो उसके लिए इतनी बेकरारी पैदा करती थी. यह सोचकर उसे खुद ही एक राहत मिल रही थी. इस तरह अपने दिल को टटोलते टटोलते वो कब उसपर पुरा का पुरा लुब्ध हुवा उसे समझ ही नहीं आया. स्टडी टूर से वापसीवाले दिन उसने हिम्मत जुटाके उसे सीधे सामनेसे खत दे दिया.
बिना कुछ कहें. उसने वो ले लिया. रूमपर आकर उसने उस खत की हर एक लब्ज को बडी दिलचस्पीसे पढा.
दुसरे दिन डिपार्टमेंट की बाहर वह उसकी राह देखही रहा था. उसने जबाव दिया, ‘अपनी पढाई पर ध्यान देते है.’ इतना कहकर वह चली गयी. उस रोज के बाद उसने भी उससे कुछ ना कहा, ना पुछा, ना बात की.
बस दोनो अपनी अपनी पढाईमें जुट गये. उसने अपनी पढाईपर ध्यान दिया और इसने अपनी पढाई पर लक्ष केंद्रीत किया.
नतीजा जब आया तो दोनो ही अपनी अपनी परिक्षाओंमें अव्वल आये थे.

कमीनापन

"साला ये लडकिया भी ना बहुत कमिनी होती है..दोस्ती मे भी उनके नखरे उठाने पडते है.."
"अच्छा, तू कितानोंके उठाता हैं. "
"यही कही चार पांच तो होगीही. हां अब ऐसे मत देख. मारोगी क्या? करना पडता है. तू ना समझेगी."
"सो तो है..मैं नहीं समझुंगी. अच्छा चल ये बता उनमेसे तेरे नखरे कितने उठाते हैं.."
"वही तो साला प्राबलम हय..उनमे से एक भी नहीं उठाती. हां लेकीन कोई हैं जो   उठाती भी है नखरे और करती भी नहीं.. " वो उसे निहारते कहने लगा.
"समझा साले लडके भी कमीने होते हैं.."
"अरे पर तू तो कह रही थी की ये तो बस वो दोस्ती से कुछ और हो तो उसके चक्कर मे..."
वो पिछेसे उसकी बात को याद करके दोहराता रहा..वो लेडीज डब्बे मे चढ गयी..! 

बरखा पिकनीक

‘‘उफ् क्या तुम्हे बारीश बिलकुल पसंद नहीं. छत्री, जर्किन, रेनकोट इतना सबकुछ लेकर आयी हो. इस ब्रीजसे पानी का बहाव देखना तो बहाना है. असल में तो मुझे तुम्हें यू कसकर पकडके आसामान को बरसता देखना होता है.  ’’
‘‘सो. देखेंगे. मैंने कहॉंं मना किया.’’
‘‘पर तुम भिगती कहॉं हो. अपने उपर ये इतने परक जो चढा लेती हो. बारीश में भिगने का अपना एक मजा होता है वो रेनकोट के भीतर या छत्री के नीचे नहीं आता.’’
‘‘मैंने तुम्हे तो मना नहीं किया ना. कुदरत की आगोश में खोकर तुम जो हर बुँद को अपने अंदरतक महसूस करते भीगते हो ना..तुम्हारे उन हसीन भीगे एहसासों को देखना मुझे तुम्हारा और भी दिवाना बनाता है पर मुझे भीगनसे सर्दी होती है, मैं क्या करूॅ?’’
‘‘रहने दो, इसका तो बस एकही मतलब है, हम कभी बारीश का त्योहार नहीं मना सकते. ’’
‘‘क्यों नहीं ? हां, मुझे सर्दी होती है. पर मैंने ये कब कहॉं की मुझे बारीश ही पसंद नहीं. मुझे बारीश भी पसंद है और तुमभी.  कहॉं जायेंगे बताओ, तुम्हारे बाईकपर तुम्हे लिपटकर बैठूंगी. फिर तुम चाहे जितने बारीशे घुमा ले आओ.’’
‘‘और फिर तुम्हारी सर्दी...ठंठ लग गयी या बिमार हुई तो...रहने दो.’’
‘‘अजी सरकार, मोहब्बत में सामनेवाले को तवज्जू देने का मतलब हमारी तमन्नाओंको गला घोटना नहीं होता है.’’
‘‘हां, बिलकुल वैसेही सामनेवाले की जान भी जोखीम में डालना नहीं होता.’’
दोनों की बात आपसमे टकरा गयी. दोनो ही हंस पडे. ब्रीज से पानी का बहाव देखते दोनों ही अपनी बरखा पिकनीक का प्लॅन बनाने में जुट गये.

बुधवार, ११ जुलै, २०१८

इश्क मे अजनबी...

स्टेशनपर उसकी राह तकते तकते वो परेशान हुवा था. लोकलके टिकट कतार से बचने के लिये उसे ऍप से टिकट भी बुक करा दी थी, फिर भी पता नहीं वो देर क्यो कर रही थी? उपर से उसके पेट के चुहे बाहर निकलने तडफ रहे थे. आखीर वो आ गयी. चर्चगेट से दादर आते आते उसने दोपहर के साडे तीन बजा दिये थे. फिर उन्हे इकठ्ठे चार बजे एक मिटींग भी पोहचना था और दोनों को ही अपने पेट के चुहों का खयाल करना था.
दादर स्टेशन बाहर के हाटेल में दोनो बैठ गये.
वेटर ने ऑर्डर पुछा.
''जल्दी क्या मिलेगा... ठीक है तो पाव भाजी लेलो. तुम क्या खाओगी?''
"जल्दी में तो पाव भाजी के अलावा उडदवडा सांबार ही नजर आ रहा है, वो ही ला दो भाई."
वेटरने अॉर्डर टेबल पर लगा दी.
"और एक कोक भी लेना." उसने जैसे ही ये कहा लडकीने चौंक कर देखा.
जैसे वो नॉनव्हेज हो और लडकेने कोई घासफुस की ऑर्डर दी. फिर भी कहा किसी ने कुछ नहीं.
वेटर ने दोनों के बीचोबीच कोक रख दी.
"कोक का नाम सूनते ही इतनी हैरान क्यों हुई? तुम भी पिलो; मना थोडी कर रहा हूँ."
"मुझे नहीं पिना है. मैने वैसी प्रतिज्ञा ली थी."
"क्या? प्रतिज्ञा? कब?" अब उसने उसे हैरानियात से देखा. मन में हंस भी पडा पर जतया नही.
"कालेज में... खैर छोडो तुम पिलो."
"कोक ना पिने की भी प्रतिज्ञा होती है क्या? वैसे क्यो ली थी ये प्रतिज्ञा?"
"रहने दो. तुम फिर पियोगे नहीं."
"तुम बताओ तो सही. मुझपर किसी बात का असर नही होगा. मैं एक झपेट मे निगल लूंगा."
"अच्छा, तो सुनो. कॉलेज मे एक संस्था आयी थी. उन्होंने एक डॉक्युमेंटरी दिखाई थी. जहां यह कोक बनानेवाली फॅक्टरिया खडी थी, वहाँ फॅक्टरी की वजहसे उन गावो को ही पिने का पानी नही मिल रहा था. उपरसे ये कोक कंपनिया गंदा पानी नदियो मे मिलाती थी. गाववालो के सफेद चावल भी काले पकते थे. कितने लोगो की उंगलिया झड चुकी थी. किसीका पेट फुल गया था. बच्चे तो बिमारी लेकर ही पैदा हो रहे थे. बस! तब हमे शपथ दिलायी की, ऐसे कोक हम नहीं पियेंगे. बस, तबसे छूंती भी नहीं."
इतना कह कर वो अपने उडद वडा सांबार मे डूब गयी.
उसके दिल में ख्याल आया, 'हद हो गयी! कॉलेज की बात अबतक पकड के बैठी है? ऐसेही मुझसे कोई वादा कर ले तो...' उसने दिल की वह बात वही छोड दी. फिर गला साफ करते हूवे उसने लडकी को पुछा,
"अब मैं क्या करु? चपटालू या.."
"तुम्हारी मर्जी. वैसे मुझे पुंछ रहे हो तो मना ही करूंगी."
"तुम अपनी इन प्रतिज्ञाओं के चक्कर मे मेरे पैसे बचाओगी या जेब खाली करोगी?" उसने झुंझला कर कहा.
वो हाथ धोने के लिये खडी हुई. मुस्कुरा कर बस उसने इतना ही कहा,
"आजमा लो... अभी थोडा और रास्ता भी तो इकठ्ठे चलना हैं." वो वॉश बेसिन के तरफ जैसे ही मुड गयी. वह समझ गया की, इश्क मे इतना भी अजनबी रहना बेवकुफी होती है!!

मंगळवार, १० जुलै, २०१८

बेपता खत

अच्छा सून...दो दिन से तेरी बहुत बहुत याद आ रही थी..एक खालीपनसा महसूस हो रहा था...पिछले दो दिनसे तेरे यादोंकी बारिश मुझे भिगाये जा रही थी...जगह जगह मैं तुम्हे मिस कर रही थी..वजह बेवजह..! फिर बैचेनी इतनी उमड आयी की, मैंने एक कविता ही लिख दी..अब हंस मत...अच्छा लिखा था, पर अब तू रुठा ही ऐसा है कि तुम्हे भेज नही सकती थी, इसलिए फिर वह कविता एक दुसरे दोस्त को भेज दी...

तेरे खयालों के उलझन में लिपटे जज्बात तुझसे बेखबर दोस्त तक पहुंचा दिये...अजीब हैं ना..मैं हूं ही अजीब.. !! खैर असली बात तो ये है की उस दोस्त ने भाप लिया, तेरी यादोंसे मेरा झुंझना.. तनहा महसूस करना..उसने कविता के जवाब में कहा,  हो सके तो तेरा ये खालीपन किसी और सच्चे दोस्त से भर जाये…’ कितनी खुबसुरत दुवा थी..मैने भी झटसे आमीन, सुम्मा आमिनकह दिया..दुवा खाली कैसे जाने देती! पर तुम्हे पता है...दुसरे ही पल खयाल आया की तेरी जगह..तुने पैदा किये इस खालीपन का सर्कल कोई नही भर सकता...मैं चाहती भी नहीं की वो भर जायेकोई और उस जगह का हमदोस्त कहलाये..ना ना बिलकुल जरुरी नही...ये सारी बैचेन खलबली है ना यही ठीक है...!

वैसे कल तेरी यादे बेपरवाह होकर परेशान कर रही थी, इसके बावजुद भी मुझे सुकून की नींद आयी…. जानते हो क्यो?

तुम्हे मिस करू इस कदर अकेलेपन का एहसास देनेवाला...इस तनहाई के भवर मे सुकून भी देनेवाला तू और सुकून मे खलल डालनेवाले तनहाई की, अकेलेपन की जगह भर जाये कह कर मेरे चैन ओ राहत की दुवा करनेवाला वो दोस्त..
दोनो भी अपनी अपनी बिंदुओंसे मेरे लिये इतमिनान हि तो मांग रहे थे...मुझे अपनी अपनी दोस्ती से खुशकिस्मत बना रहे थेमुझे अजीज कर रहे थे..!

तुम्हे क्या बताऊं कितनी सुकून की नींद सोयी…!

सुफियान अन त्याचे मित्र

गोष्ट तशी गंमतीची.   माझ्या घरासमोर राहाणारी दोन छोटी मुल माझ्या तीन वर्षाच्या सुफियानचे मित्र आहेत. त्यातील छोटा हा सुफियानपेक्षा फक्त ...